नब्बे का दशक, नास्टैल्जिया और नागराज




सन 1989 में जनम लेने का सबसे अच्छा फायदा मुझे ये हुआ की "नब्बे के दशक का बच्चा" कहलाने का मुझे "आल-एक्सक्लूसिव" व्ही.आई.पी पास मिला| आजकल के मिलेनियल्स के ठीक उलट, जो 1999 में पैदा होने पर भी खुद को हमारी बराबरी का मानते हैं, हमारे पास मनोरंजन के सीमित संसाधन हुआ करते थे| इनमे सबसे ऊपर रहे, चलचित्र के नाम पर दूरदर्शन और अलौकिक शक्तियों के सन्दर्भ में "अलिफ़-लैला" और "चंद्रकांता" रुपी कार्यक्रम|

यूँ तो दुनिया और खासकर अमेरिका पर परग्रही वासी पहले भी हमला करते थे, पर आयरन मैन, स्पाइडर मैन, थॉर और हल्क जैसे अवेंजर्स हमारे शब्दकोष में जीवन के बीस बसंत पार करने के उपरांत ही आये| ऐसे में हम कम प्रोग्रेसिव पीढ़ी के लिए देसी कॉमिक्स, ही "डूबते को तिनके का सहारा" की असली परिभाषा थीं| हमारे लिए डायमंड या राज कॉमिक्स के पन्ने किसी हैरी पॉटर की जादुई दुनिया से कम नहीं थे| यूँ तो राज कॉमिक्स ने कई सुपरहीरोस और सुपर्विलैंस को पन्नों पर अंकित किया, मगर घनी ज़ुल्फ़ों और भारी भुजाओं के धनि श्री श्री नागराज का मुक़ाबला कर पाना शायद ही किसी के बस में था |


अपनी चमड़ी से चिपकी हरी पोशाक में वो स्वयं "ग्रीन लैंटर्न" के देसी और पौराणिक रूप से कुछ कम था | नाग मणि, नागलोक और पृथ्वीलोक जैसे हिंदी के शशि थरूर स्तरीय शब्दों से पहला परिचय नागराज पढ़ के ही हुआ | नाग रस्से से ऊँची इमारतों को आसानी से पार पाने, अपने मस्तिष्क की तरंगों से नागों की सेना का आह्वाहन करने जैसे चमत्कार करके हमारी आँखों को विस्मय से फाड़ने वाले नागराज को शायद ही नब्बे के दशक का कोई बच्चा अपने स्मृति से मिटा पाए|


यूँ तो मैंने चित्रकारी कहीं सीखी नहीं मगर गर्मियों की छुट्टी में नानी के घर देहरादून [मोकमपुर] जाते समय खरीदी गयी कॉमिक्स, और मामा के द्वारा भेंट स्वरुप दी हुई कोरे पन्नों की नोटबुक के विहंगम मिलन ने असीम भुजाओं के प्राणियों के चित्र बनाने की कला मेरे अंदर अपने आप पनपा दी| टूटे हुए क्रेयॉन्स, ब्लेड से धार दी गयी नटराज की पेंसिल और दीवार पर घिस-घिस कर काले से सफ़ेद किये गए इरेज़र [रबड़] को अपने हाथों की पहुँच में रख, रात के आखिरी बल्ब के उजाले तक चित्रकारी करने का भी अपना ही एक मज़ा था|

आज इतने वर्षों बाद जब घर की सफाई में फिरसे बचपन के विश्वरक्षक नागराज से सामना हुआ तो लगा की फिर से 10 साल का एक देवांशु अभी अपनी मां की गोद में बैठकर, पानी से हवा ठंडी करने वाले कूलर रुपी अविष्कार के अनुभव की सुखद अनुभूति करते हुए पन्ने पलटेगा और शायद बचपन की ही तरह कॉमिक पढ़ने के बाद सीधे उस कोरे पन्ने की नोटबुक में चित्र बनाने में लीन हो जायेगा| |

और फिर आज के युवा कहते हैं की बचपन उन्होंने जिया है| कभी नब्बे के दशक से उनके अनुभव साझा तो कीजिये जनाब, आप शर्म से डूब मरेंगे |

Breathe

My mindfulness blog

Get my daily tips on mindful living

Breathe by Tammy Gallaway

Mail: info@mysite.com

Phone number: 123-456-7890

© 2023 by Tammy Gallaway. Proudly created with Wix.com