चित्रहार, शक्तिमान और डब्लू. डब्लू.ऍफ़ वाला रविवार




यूँ तो नब्बे का दशक कई अविस्मरणीय घटनाओं का परिचायक रहा, मगर इनमे कुछ ऐसी स्मृतियाँ भी रहीं, जिन्हें हम आज दिल के करीब रखते हैं| पृथ्वी की संरचना से लेकर वर्तमान तक जिस तरह से मानव जाती के विकास को अलग-अलग काल-खण्डों में बांटा गया है, उसे ध्यान में रखते हुए आप हम "नब्बे के दशक के बच्चों" को पौराणिक काल की समाप्ति और आधुनिक काल की शुरुआत के मध्य में कहीं पटक सकते हैं| ये ऐसा दौर था जब हमने दूरदर्शन से लेकर केबल टी.वी., कैसेट रिकॉर्डर से लेकर वी.सी.डी. टेप्स और समुराई के वीडियो गेम्स से लेकर निनटेंडो तक सबका अनुभव किया|


आज के बच्चों के द्वारा अकल्पनीय और रोचक चित्र कथाओं की काल्पनिक दुनिया से तुलना किये गए इस युग की कई रोचक बातें आज के किस्से कहानियों में बुनी जा सकती हैं| मिसाल के तौर पर अगर हम ये कहें की हमारे द्वारा मासूम कन्धों पर लादे गए स्कूल के बस्तों का वज़न कई बार हमसे भी अधिक होता था तो शायद हिंदी में इसे उपमा अलंकार का उचित उदहारण माना जाए|


मगर आज हमारा मुद्दा पुरातन काल में बस्ते के बोझ तले दबे आज के नर्डी व्यसक का नहीं, परन्तु इक्कीसवीं शताब्दी अर्थात घोर कलयुग के ठीक पहले स्वयं से उपाधि प्राप्त सत युग के एक ख़ास दिन "रविवार" का है| जी हाँ दोस्तों| वही रविवार जिसे आज की "नाईट आउट" और "चिलिंग विथ फ्रेंड्स ऑन वीकेंड" वाली जनरेशन केवल शनिवार रात के हैंगओवर को उतारने के काम में लाती है| अगर रविवार खुद आज इंसान रूपी अवतार में प्रकट हो तो अपनी उपयोगिता के इस अलौकिक बदलाव से भौचक्का रह जाए|


रविवार - अर्थात कैलेंडर का वो खास दिन जिसे छापने में "लाला रामस्वरूप राम नारायण एंड संस" पंचांग वाले भी अलग रंग (चटक लाल) की स्याही का प्रयोग करते और अपने प्रिंटिंग के बजट को बढ़ाते थे| अब आखिर किसी दिन को अगर हिन्दुस्तान के बच्चे और बुज़ुर्ग हर हफ्ते "फैमिली पिकनिक" का अच्छा बहाना माने, और नए-नए व्यसक हुए प्रेमी जोड़े, हफ्ते भर की कॉलेज क्लास रुपी "देहाड़ी मज़दूरी" के बाद मिलने की उपयोगिता में लाएं, तो उसपर अलग रंग की स्याही खर्च करना तो बनता ही था|


आज के विपरीत, नब्बे के दशक में रविवार घर में काम करने आने वाली बाई के कमरे में चालू पंखे को बंद करने के एहसास और ठीक सात बजे माँ के द्वारा टी.वी. पर फुल वॉल्यूम में चित्रहार के प्रसारण चालु करने की आवाज़ के साथ शुरू होता था| जैसे-जैसे चित्रहार में गानों की श्रंखला बढ़ती जाती, वैसे-वैसे रसोईघर से पोहे, इडली, डोसा, मैगी या ऐसे ही अन्य किसी "लक्ज़री" समझे जाने वाले पकवान की महक तीव्र होती जाती| आठ से नौ के उस कालखंड में घर के सभी सदस्य नहा कर, "मॉडर्न डे गर्ल-फ्रेंड्स" की तरह, लिविंग रूम के मध्य पड़ी डाइनिंग टेबल को इग्नोर करते हुए, अपने कम्फर्ट और प्राइवेसी के अनुसार जगह हड़प लेते; और ठीक नौ बजे, दूरदर्शन पर, श्री कृष्णा के प्रसारण में स्वप्निल जोशी को खुद भगवान का अवतार मान अपने पापों की क्षमा मांगते|


हम बच्चों के लिए यह दिन दो कारणों से विशेष था - पहला यह की इस दिन गृहकार्य अर्थात होमवर्क का बोझ हमारे नाज़ुक कन्धों पर नहीं पड़ता और दूसरा इसलिए क्यूंकि भारत के पहले सुपरहीरो शक्तिमान को रा-वन मूवी से भी ख़राब बने हुए सी.जी.आई इफेक्ट्स के साथ देखने का हमे सौभाग्य प्राप्त होता| आज के मिलेनियल्स शायद यह बात न पचा पाएं की उस ज़माने में लड़की के चक्कर में नहीं, मगर शक्तिमान बचाने आएगा कहकर कई नौसिखिये लौंडे छतों से कूद कर अपनी हड्डी तुड़वाने के लिए मशहूर हुए|


शक्तिमान की "छोटी छोटी मगर मोटी बातों से" घर में समय के पहले ही बाघबान मूवी का डेजावू इफ़ेक्ट होने पर हम होनहार बच्चों का शरणस्थल बनी मोहल्ले की प्लेस्टेशन की दुकानें जहां पी.एस.वन पर रैंडी ओर्टन वर्सेज़ ट्रिपल एच या रिक फ्लेयर वर्सेज हल्क होगन के वर्चुअल फाइट्स पर दस-दस रुपये का सट्टा लगता| तपती धुप, माँ की सी.आई.डी नज़रें और पिताजी की बेबसी-की भगवान मोबाइल का अविष्कार जल्दी क्यों नहीं हुआ; इन सब से बचते हुए किसी तरह रविवार की दोपहर हमारे लिए दोस्ती में नए मोड़ लाने के लिए जानी गयी| शाम को क्रिकेट मैदान में नहीं, मगर घर के सामने की गली या कई बार तो गमले को विकेट बना कर घर के आँगन में ही होता| नाली से गेंद भी वही निकालता जिसने बल्ला घुमाया और कांच में लगना या पडोसी के घर गेंद का जाना मतलब बल्लेबाज़ का आउट होना|


इतनी कम उम्र में इतने सारे मोदी-समान कार्यों को पूरा करने के बाद थक हार कर दादा दादी से कहानी सुनना या टी.वी. पर औरतों वाले कार्यक्रम डॉज करते हुए कार्टून नेटवर्क लगा कर महर्षि व्यास के जैसे ध्यान में लीन होना एक कूल-लाइफस्टाइल माना जाने लगा| बेब्लेड्स और ड्रैगन बाल-ज़ी के अत्यंत कठिन तथ्यों को याद करके खुद को सोमवार के रेसेस पीरियड के लिए तैयार करना गर्व की बात होती थी|


माना की उस समय स्मार्टफोन्स का अविष्कार तो क्या, यह शब्द भी ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी में नहीं पैदा हुआ था, मगर लैंडलाइन की आवाज़ सुनकर पड़ोस तक दौड़ जाना अपने आप में एक प्रभाव उत्पन्न करता था| छत पर चढ़ कर टी.वी. ऐन्टेना हिला कर "आया क्या?" प्रश्न पूरे मोहल्ले के घरों से "हाँ आगया" की आवाज़ निकलवाता था| और हाँ प्लेस्टेशन तो आगे भी आये, एम्.टी.वी. या अन्य म्यूजिक चैनल पर गाने अभी भी प्रसारित होते हैं, मगर दोस्तों के साथ वो "एक्स वाले बटन से स्मैक मार" की यादें और आधी नींद में शम्मी कपूर को "चाहे कोई मुझे जंगली कहे" पर कमर मटकाते देखना अलग ही अनुभूति थी, जिसे आज की ये नो-स्ट्रिंग्स-अटैच्ड जनरेशन शायद ही कभी समझ पाए; कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा| जीना तो मुमकिन नहीं, मगर उन दिनों को याद करके मुस्कराने में पल दो पल क्या ही बुराई है|

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