हैप्पी मदर्स डे माँ !!!




हैप्पी मदर्स डे माँ !!!


आज मदर्स डे है - अर्थात मातृत्व दिवस । साल का शायद वो इकलौता दिन जब घर के किसी कोने में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा [हमे मिलाकर] बेतरतीब और बेढंगे तरीके से रखे हुए सामान को चुपचाप समेटती माँ को हम उसके ख़ास होने का एहसास दिलाते हैं । वो इकलौता दिन जब हम अपने फेसबुक, इन्स्टाग्राम, ट्विटर जैसे सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर "लव यू माँ" के सन्देश के साथ उसकी और हमारी बरसों पुरानी खींची हुई "कैंडिड-पिक" को ला पटकते हैं और उसके प्रति हमारे हर कर्तव्य को पूर्ण घोषित कर देते हैं । पर शायद हमारे आये-दिन के नखरों को उठाते, "कहानी घर-घर की" के जैसे होने वाले रोज़ के भाई-बहन के झगड़ों को सुलझाते, या परिवार के हर सदस्य की फरमाइशों को पूरा करवाते-करवाते हम ये भूल ही गए, की हमने हमारी माँ को "फेसबुक" पर पोस्ट तो कर दिया, पर क्या उसे इस नयी तकनीक को चलाना सिखाया। अगर नहीं [जो की हम में से नब्बे प्रतिशत जनता का जवाब होगा] तो क्या हमने कभी उसकी व्यस्तता को समझ कर उसे खुद के लिए कुछ समय निकालने का भी मौका दिया ? नहीं दिया ! और फिर हम अपेक्षा करते हैं की वो हमारे "लव यू माँ" के ऑनलाइन पोस्ट को देखकर बहुत खुश होगी । विस्मय होता है !!!


हम सभी भारत देश के आदर्श मध्यम-वर्गीय परिवारों में पले बढ़े हैं - जहां बचपन से पचपन तक हमारी माँ हमारी नस-नस जानती है । रात को खाने में एक रोटी कम खाने से मूड ख़राब होने का अंदेशा होने से लेकर बाथरूम के शीशे के सामने पांच घड़ी ज़्यादा बिताने पर किसी ख़ास से हमारी मुलाकात का यकीन होने तक - शायद अपने बच्चे को एक माँ ही पूरी तरह से समझ पाती है । और ऐसा हो भी क्यों न । एक माँ और उसके बच्चे का रिश्ता दुनिया के हर रिश्ते से अलग जो ठहरा । नौ महीने अपनी कोख में एक नए जीवन को सहेजने से लेकर उसके पैदा होने पर उसकी पहली गुरु होना - अपने आप में इस रिश्ते की अहमियत को बहुत भली भांति समझाता है।


यूँ तो पौराणिक काल से लेकर आधुनिक युग तक माँ के कई रूपों की व्याख्या हमे किसी न किसी रूप में पढ़ने और सुनने को मिलती है लेकिन बचपन में माँ की गोद में सर रखकर लोरियां सुनना और रसोईघर में बैठकर दाल में लगे हर छौंक के साथ उसकी बुनी नयी-नयी कहानियों को सुन विस्मय से अपनी आँखों को फाड़ना अपने आप में हमारे बीते हुए कल के कुछ यादगार पलों में से एक है। आज की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में जहाँ हम शायद ही कभी दो पल सुकून से बैठ कर अपनी माँ से बात कर पाते हों - मगर एक पल को आँख बंद करके फिरसे उन् लम्हों को जीने का अपना अलग ही एक मज़ा है। अब चाहे वो पंचतंत्र की रोचक चित्र कथाएं हों या मालगुडी डेज़ के मज़ेदार किस्से - गर्मियों की छुट्टियों में इन् किताबों को पढ़ने का जो मज़ा माँ के साथ आता था, वो आज बंद कमरों और फाइलों के ढेर में दबी मेज़ों पर बैठ कर पढ़ने में कहाँ ।


आज हम सबने अपनी माँ को हैप्पी मदर्स डे विश तो किया होगा पर शायद ही कभी हम सही मायने में इस दिन को मना पाएं। आखिर वो हमारी माँ है - रसोईघर से उठती छौंक की खुशबू से लेकर पूजाघर से आती आरती की आवाज़ में - हर जगह उसकी छवि है । कभी सोचो तो यकीन होगा जैसे घर का हर कोना उसके बिना अधूरा ही नज़र आता है। कभी सुकून से सोचें तो शायद माँ की हर उपलब्धि को मनाने में एक क्या कई मदर्स डे भी कम पड़ जायेंगे । हम उससे लड़ते हैं, झगड़ते भी हैं, कई दफा उसकी बातों से असहमत भी होते हैं और उन्हें नज़रअंदाज़ भी करते हैं, हमसे ज़्यादा उसका दिल शायद ही कभी कोई दुखाता होगा; मगर फिर भी हमारी हर गलती को अनदेखा कर हमारी छोटी से छोटी ख़ुशी को भी त्यौहार से कम न समझे - वो हमारी माँ है । कुछ वक़्त पहले लिखी मेरी ही इन् पंक्तियों से शायद उसके अस्तित्व की एक छोटी सी झलक हमे मिल सके -


" वो कौशल्या की वाणी है

केकई की आत्म-ग्लानि है

वो डाँट यशोदा माता की

उसकी हर स्नेह-कहानी है। "


माँ सिर्फ एक शब्द नहीं उसके बच्चों के लिए अपने आप में एक सम्पूर्ण संसार है। उसके अस्तित्व से हमे भरोसा रहता है की हमे हमसे भी ज़्यादा कोई प्यार करता है - और उसके बदले में वो हमारी ही ख़ुशी चाहता है। मुझे ये समझने में बत्तीस साल लग गए। किसी शायर ने क्या खूब कहा है -

"दवा काम ना आये तो नज़र भी उतारती है

ये माँ है साहब - हार कहाँ मानती है। "

हैप्पी मदर्स डे माँ । तुम्हें लगा मैं भूल गया मगर सब कहते हैं की मैं बिलकुल तुम्हारे जैसा दिखता हूँ - तो जो मुझमे है उसे भूल पाना मुमकिन नहीं ।


तुम्हारा

देवांशु